सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक पूर्व नौकरशाह को ₹920 अरब के ग्रेट निकोबार द्वीप प्रोजेक्ट के लिए केंद्र और अंडमान-निकोबार प्रशासन से मिली कानूनी मंज़ूरी को चुनौती देने से नहीं रोका। इसके बजाय, कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट से कहा कि वह इस मामले की सुनवाई में तेज़ी लाए और जल्द से जल्द इस चुनौती पर फ़ैसला करे।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने कहा कि इस मामले का फ़ैसला सिर्फ़ ‘सुनवाई योग्य होने’ (मेंटेनेबिलिटी) के सवाल पर नहीं किया जा सकता, जिसे हाईकोर्ट पहले ही तय कर चुका है। बेंच ने संकेत दिया कि हाई कोर्ट को इस बड़े सवाल की जांच करनी होगी कि क्या जनहित में की गई यह चुनौती अभी भी बनी हुई है या नहीं।
बेंच ने द्वीप पर रहने वाली आदिवासी जनजातियों की संस्कृति की रक्षा के संवैधानिक महत्व पर भी ज़ोर दिया। साथ ही, चेतावनी दी कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को व्यावसायिक शोषण से अलग करके देखा जाना चाहिए; उन्हें एक जैसा नहीं माना जा सकता।
कोर्ट का यह दखल केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की उस चुनौती की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें उन्होंने पोर्ट ब्लेयर में कलकत्ता हाई कोर्ट की सर्किट बेंच के 6 मई के आदेश को चुनौती दी थी। उस आदेश में पूर्व आईएएस अधिकारी मीना गुप्ता की याचिका के ‘सुनवाई योग्य होने’ पर प्रशासन की आपत्तियों को खारिज कर दिया गया था।
गुप्ता, जो केंद्रीय जनजातीय मामलों और पर्यावरण मंत्रालयों में सचिव रह चुकी हैं और ‘वन अधिकार अधिनियम, 2006’ का मसौदा तैयार करने में शामिल थीं, ने इस प्रोजेक्ट की मंज़ूरी को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि इससे स्थानीय शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के कानूनी और पारंपरिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।
गुप्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एस. मुरलीधर ने बेंच को बताया कि आदिवासी परिषदों ने कार्यवाही में दखल देने की कोशिश की थी क्योंकि दोनों आदिवासी जनजातियों ने शिकायत की थी कि प्रोजेक्ट को मंज़ूरी देने से पहले उनकी बात नहीं सुनी गई थी।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी की मदद से इस बात का खंडन किया और कहा कि आदिवासी समुदायों की बात सुनी गई थी।
हालांकि, बेंच ने जनजातियों की खास स्थिति और उनकी जीवनशैली को बचाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। बेंच ने कहा, “ये अनोखी जनजातियां हैं और इन्हें बचाए रखने की ज़रूरत है।” बेंच ने यह भी गौर किया कि ग्रेट अंडमानी जनजातियां काफ़ी हद तक मुख्यधारा में शामिल हो चुकी हैं। बेंच ने सवाल किया, “सवाल यह है कि अगर शोम्पेन जनजातियां अपनी खासियत को बचाए रखना चाहती हैं, तो क्या उन्हें ऐसा करने का मौका मिलना चाहिए?”
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आदिवासी संस्कृति को बचाना सिर्फ़ एक पॉलिसी का मामला नहीं है, बल्कि इसे संवैधानिक सुरक्षा भी मिली हुई है। बेंच ने कहा, “संस्कृति को बचाना एक संवैधानिक रूप से सुरक्षित मौलिक अधिकार है। जब आप इको-पार्क की बात करते हैं, तो यह पर्यावरण से जुड़ा मामला होता है। आदिवासी संस्कृति को संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।”
अटॉर्नी जनरल ने जवाब दिया कि कोर्ट के सामने जो मामला है, वह अलग है और “देश के लिए बहुत ज़रूरी” एक प्रोजेक्ट से जुड़ा है।
हालांकि, बेंच ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों और कमर्शियल डेवलपमेंट के बीच फ़र्क करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। बेंच ने कहा, “राज्य की सुरक्षा और कमर्शियल इस्तेमाल के बीच फ़र्क होना चाहिए।”
इस स्टेज पर चुनौती की खूबियों की जांच करने के बजाय, बेंच ने निर्देश दिया कि हाई कोर्ट इस मामले पर तेज़ी से सुनवाई करे। बेंच ने कहा, “हम हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस से अनुरोध करेंगे कि वे इस मामले पर जल्द फ़ैसला लें।”
मुरलीधर ने बताया कि इस मामले की सुनवाई पहले से ही 25 और 26 नवंबर के लिए तय है।
यह नोट करते हुए कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि मामले का जल्द से जल्द फ़ैसला होना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह ज़रूरी कागज़ी कार्रवाई पूरी करे और सुनवाई पूरी करने की कोशिश करे।
कलकत्ता हाई कोर्ट के 6 मई के आदेश में केंद्र की उस आपत्ति को खारिज कर दिया गया था जिसमें कहा गया था कि गुप्ता के पास जनहित याचिका दायर करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि किसी भी जंगल में रहने वाले आदिवासी व्यक्ति ने उन्हें कोर्ट जाने के लिए अधिकृत नहीं किया था।
हाई कोर्ट ने गुप्ता के बैकग्राउंड पर ध्यान दिया – वे आदिवासी मामलों और पर्यावरण मंत्रालयों की पूर्व सेक्रेटरी रही थीं, ‘फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट’ बनाने में शामिल थीं और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से पहले भी जुड़ी रही थीं। कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ इसलिए याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता कि याचिकाकर्ता द्वीप समूह की निवासी नहीं हैं, खासकर तब जब चुनौती कमज़ोर समुदायों के अधिकारों से जुड़ी हो, जिनके पास खुद कोर्ट जाने के साधन नहीं हो सकते हैं।
हाई कोर्ट ने गुप्ता की चुनौती को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में चल रही उस कार्यवाही से भी अलग माना जो प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण मंज़ूरी से जुड़ी थी। उनकी याचिका मुख्य रूप से उन इलाकों में ‘फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट’ के पालन से जुड़ी है जो प्रोजेक्ट से प्रभावित हो सकते हैं, और साथ ही शोम्पेन और निकोबारी समुदायों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी है। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एक पावर कॉम्प्लेक्स और एक शहरी टाउनशिप बनाने की योजना है।
यह प्रोजेक्ट रणनीतिक रूप से अहम द्वीप पर बनाया जा रहा है, जो मलक्का जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के पास है। सरकार ने इसे भारत के समुद्री और रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण बताया है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का इस्तेमाल किया जाएगा और हजारों पेड़ काटे जाएंगे।
आदिवासी समुदायों के अधिकार और उनकी सहमति इस प्रोजेक्ट का एक विवादित पहलू रहा है। शोम्पेन को ‘विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह’ के तौर पर वर्गीकृत किया गया है और वे द्वीप के जंगलों में काफी हद तक अलग-थलग जीवन जीते हैं।
(जनचौक ब्यूरो)